मृत्यु और उत्तराधिकार CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ

After three weeks of illness, Shivaji died in 3 April 1680. At that time, Shivaji's succession was to Sambhaji. Shivaji's eldest son was Sambhaji and his second wife was Rajaram with his second wife. At that time, Rajaram 's age was only 10 years and the Marathas considered Shambhaji as the king. At that time Aurangzeb King Shivaji's death, seeing his whole country to state that derives from its 500,000 troops Sea craves winning South India. Aurangzeb came to South and Adilshahi was finished in 2 days and Qutubshahi in 1 day. But under the leadership of Raja Sambhaji, Marathao kept his independence while fighting for 9 years. Aurangzeb's son, Shahzada Akbar , AurangzebAgainst the rebels. Sambhaji gave him asylum here. Aurangzeb has now started aggressively attacking against Sambhaji. At last, in 1689 Sambhaji's brother, Biwi, made the arrest of Sambhaji by Mukarv Kha in the mouth of Ganojiji Shirke. Aurangzeb reprimanded Raja Sambhaji and killed him badly. Seeing that Aurangzeb's bad luck was bad in his King, all Maratha Swarajya was angry. He continued his struggle with the Mughals in the Netrutata of Rama, the third king with his full force. Rajaram died in 1700 AD. After that, Rajaram's wife Tarabai continued to rule by becoming the protector of 4-year-old son Shivaji II . After all, 25 years buried in the Swarajya of Shivaji, the same Chhatrapur of Aurangzeb, who was tired of fighting against Maratha independence of 25 years .

मृत्यु और उत्तराधिकार
तीन सप्ताह की बीमारी के बाद शिवाजी की मृत्यु 3 अप्रैल 1680 में हुई। उस समय शिवाजी के उत्तराधिकार संभाजी को मिले। शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र संभाजी थे और दूसी पत्नी से राजाराम नाम एक दूसरा पुत्र था। उस समय राजाराम की उम्र मात्र 10 वर्ष थी अतः मराठों ने शम्भाजी को राजा मान लिया। उस समय औरंगजेब राजा शिवाजी का देहान्त देखकर अपनी पूरे भारत पर राज्य करने कि अभिलाशा से अपनी ५,००,००० सेना सागर लेकर दक्षिण भारत जीतने निकला। औरंगजेब ने दक्षिण में आतेही अदिल्शाहि २ दिनो में ओर कुतुबशहि १ हि दिनो में खतम कर दी। पर राजा संभाजी के नेतृत्व में मराठाओ ने ९ साल युद्ध करते हुये अपनी स्वतन्त्रता बरकरा‍र रखी। औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर ने औरंगजेब के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया। संभाजी ने उसको अपने यहाँ शरण दी। औरंगजेब ने अब फिर जोरदार तरिकेसे संभाजी के ख़िलाफ़ आक्रमण करना शुरु किया। उसने अन्ततः 1689 में संभाजी के बिवी के सगे भाई ने याने गणोजी शिर्के की मुखबरी से संभाजी को मुकरव खाँ द्वारा बन्दी बना लिया। औरंगजेब ने राजा संभाजी से बदसलूकी की और बुरा हाल कर के मार दिया। अपनी राजा को औरंगजेब ने बदसुलुकि ओउर बुरी हाल मारा हुआ देखकर सबी मराठा स्वराज्य क्रोधित हुआ। उन्होने अपनी पुरी ताकद से तीसरा राजा राम के नेत्रुत्व में मुगलों से संघर्ष जारी रखा। 1700 इस्वी में राजाराम की मृत्यु हो गई। उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने 4 वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षिका बनकर राज करती रही। आखिरकार २५ साल मराठा स्वराज्य के यूदध लडके थके हुये औरंगजेबकी उसी छ्त्रपती शिवाजी के स्वराज्य में दफन हुये।

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