धार्मिक नीति चरित्र CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ

CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ,






Religious policy 

Shivaji was a devoted Hindu and he was also a religious tolerant. The Muslims had religious freedom in their empire . Shivaji gave a grant to build many mosques . Like the Hindu Pandits , Muslim saints and dignitaries also received respect. His army was also a Muslim soldier. Shivaji encouraged Hindu form . The emphasis on traditional Hindu values ​​and education was emphasized. He used to start his campaigns at the occasion of Dussehra .

Character

Shivaji Maharaj received the education of Swaraj from his father only when the Sultan of Bijapur took Shahji Raje to the prison, like an ideal son, he got rid of Shahaji Raje by making a treaty with the Shah of Bijapur. This gives him a generous component in his character. After that, he did not kill the father as other monarchs used to do. After the death of Shahaji, he made his coronation even though he had become independent from his father till that time and became the ruler of a big empire . Everyone used to accept his leadership, this is the reason why there was no major event like an internal rebellion during his reign.
He was also a good diplomat with a good commander. In many places they participated in the war rather than fighting the war. But that was his diplomacy, which kept him cooperating with the big enemy every time.
Shivaji Maharaj's "guerrilla kava" is a diplomacy in which the enemy is suddenly attacked and defeated, bewildered and respected.

These rows are famous in the pride of Shivaji Maharaj-
The eighth appearance of Shivrajaya Eighth episode of Shivrajaya
Shivrajaya's eighth Pratap The global

धार्मिक नीति

शिवाजी एक समर्पित हिन्दु थे तथा वह धार्मिक सहिष्णु भी थे। उनके साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी। कई मस्जिदों के निर्माण के लिए शिवाजी ने अनुदान दिया। हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को भी सम्मान प्राप्त था। उनकी सेना में मुसलमान सैनिक भी थे। शिवाजी हिन्दू संकृति को बढ़ावा देते थे। पारम्परिक हिन्दू मूल्यों तथा शिक्षा पर बल दिया जाता था। वह अपने अभियानों का आरम्भ भी अकसर दशहरा के अवसर पर करते थे।

चरित्र

शिवाजी महाराज को अपने पिता से स्वराज की शिक्षा ही मिली जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र की तरह उन्होंने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को छुड़वा लिया। इससे उनके चरित्र में एक उदार अवयव ऩजर आता है। उसेक बाद उन्होंने पिता की हत्या नहीं करवाई जैसा कि अन्य सम्राट किया करते थे। शाहजी राजे के मरने के बाद ही उन्होंने अपना राज्याभिषेक करवाया हँलांकि वो उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे। उनके नेतृत्व को सब लोग स्वीकार करते थे यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी।
वह एक अच्छे सेनानायक के साथ एक अच्छे कूटनीतिज्ञ भी थे। कई जगहों पर उन्होंने सीधे युद्ध लड़ने की बजाय युद्ध से भाग लिया था। लेकिन यही उनकी कूटनीति थी, जो हर बार बड़े से बड़े शत्रु को मात देने में उनका साथ देती रही।
शिवाजी महाराज की "गनिमी कावा" नामक कूटनीति, जिसमें शत्रु पर अचानक आक्रमण करके उसे हराया जाता है, विलोभनियता से और आदरसहित याद किया जाता है।

शिवाजी महाराज के गौरव में ये पंक्तियाँ प्रसिद्ध हैं-
शिवरायांचे आठवावे स्वरुप। शिवरायांचा आठवावा साक्षेप।
शिवरायांचा आठवावा प्रताप। भूमंडळी ॥






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