शासन और व्यक्तित्व CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ


CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ,






Governance and Personality

Shivaji is known as a skilled and enlightened monarch . Though he did not get a formal education in his childhood, he was well-versed with Indian history and politics. He considered Shukracharya and Kautilya as ideal and used to resort to diplomacy many times. Like his contemporary Mughals, he was an autocratic ruler, that is, the whole regime of governance was in the hands of the king. But there was a council of eight ministers to help him in his administrative work, which was called the Eighth Prime Minister . In this the head of the ministers was called Peshwa , which was the most prominent figure after the king. Amatya looked at the work of finance and revenue then the ministerThe king's personal daily care was taken care of. The Secretary used to work in the office, which included the royal seal and the preparation of a letter of treaty papers. Sumant was the external affairs minister. The army chief was called the commander . The head of charity and religious affairs was called Panditrao . Judge was the head of judicial affairs.
The Maratha empire was divided into three or four divisions. In each province there was a Subedar called Prantipati. Every subedar also had an eight-headed committee. Some states were only taxpayers and independent in case of administration. Judiciary was based on ancient method. Shukracharya , Kautilya and Hindu theology were judged on the basis of the basis. Patel's village used to check foreclosure cases The income of the state was a result of the income but the revenue was recovered even from the fourth and the sardarajmukhi. The 'fourth' neighbor tax was taxed to guarantee the security of neighboring states. Shivaji used to call himself the Sardeshmukh of the Marathas, and in this capacity was duly ordained by the sermons.
After the coronation, he entrusted his one minister ( Ramchandra Amatya ) with the task of creating the appropriate Sanskrit words for Persian words in government use . Ramchandra amatya the Dhundhiraj help scholars called Rajywyvharkosh manufactured treatise called. In this dictionary 1380 were the Sanskrit words corresponding to Persianwords of Persian . Ramchandra has written in it:
Predatory Muckshadowed Bhavi Niviravya Ravikula-
Vantansantatha Yavnavarnarluptasaranim
Nripavaharatha Sutu Vibudhashan Dnyanitum
Nayyitoubhudvadnutrapav Shivchchatrapatana

शासन और व्यक्तित्व

छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा चलाया गया सिक्का
शिवाजी को एक कुशल और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाना जाता है। यद्यपि उनको अपने बचपन में पारम्परिक शिक्षा कुछ खास नहीं मिली थी, पर वे भारतीय इतिहासऔर राजनीति से सुपरिचित थे। उन्होंने शुक्राचार्य तथा कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति का सहारा लेना कई बार उचित समझा था। अपने समकालीन मुगलों की तरह वह भी निरंकुश शासक थे, अर्थात शासन की समूची बागडोर राजा के हाथ में ही थी। पर उनके प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद थी जिन्हें अष्टप्रधान कहा जाता था। इसमें मंत्रियों के प्रधान को पेशवा कहते थे जो राजा के बाद सबसे प्रमुख हस्ती था। अमात्य वित्त और राजस्व के कार्यों को देखता था तो मंत्री राजा की व्यक्तिगत दैनन्दिनी का खयाल रखाता था। सचिव दफ़तरी काम करते थे जिसमे शाही मुहर लगाना और सन्धि पत्रों का आलेख तैयार करना शामिल होते थे। सुमन्त विदेश मंत्री था। सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे। दान और धार्मिक मामलों के प्रमुख को पण्डितराव कहते थे। न्यायाधीश न्यायिक मामलों का प्रधान था।
मराठा साम्राज्य तीन या चार विभागों में विभक्त था। प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार था जिसे प्रान्तपति कहा जाता था। हरेक सूबेदार के पास भी एक अष्टप्रधान समिति होती थी। कुछ प्रान्त केवल करदाता थे और प्रशासन के मामले में स्वतंत्र। न्यायव्यवस्था प्राचीन पद्धति पर आधारित थी। शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिन्दू धर्मशास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था। गाँव के पटेल फौजदारी मुकदमों की जाँच करते थे। राज्य की आय का साधन भूमिकर था पर चौथ और सरदेशमुखी से भी राजस्व वसूला जाता था। 'चौथ' पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा की गारंटी के लिए वसूले जाने वाला कर था। शिवाजी अपने को मराठों का सरदेशमुख कहता थे और इसी हैसियत से सरदेशमुखी कर वसूला जाता था।
राज्याभिषेक के बाद उन्होंने अपने एक मंत्री (रामचन्द्र अमात्य) को शासकीय उपयोग में आने वाले फारसी शब्दों के लिये उपयुक्त संस्कृत शब्द निर्मित करने का कार्य सौंपा। रामचन्द्र अमात्य ने धुन्धिराज नामक विद्वान की सहायता से 'राज्यव्यवहारकोश' नामक ग्रन्थ निर्मित किया। इस कोश में १३८० फारसी के प्रशासनिक शब्दों के तुल्य संस्कृत शब्द थे। इसमें रामचन्द्र ने लिखा है-
कृते म्लेच्छोच्छेदे भुवि निरवशेषं रविकुला-
वतंसेनात्यर्थं यवनवचनैर्लुप्तसरणीम्।
नृपव्याहारार्थं स तु विबुधभाषां वितनितुम्।
नियुक्तोऽभूद्विद्वान्नृपवर शिवच्छत्रपतिना ॥८१॥

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