बीजापुर से संघर्ष CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ

 CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ







Conflicts with Bijapur
Here Aurangzeb in Agra Sultan of Bijapur after return () on the north side heaved a sigh of relief. Now Shivaji was the most powerful enemy of Bijapur. Shahaji was asked to keep his son in control, but Shahaji expressed his inability to it. To deal with Shivaji, Sultan of Bijapur sent Abdullah Bhatari (Afzal Khan) against Shivaji. Afzal traveled in 1659 with 120000 soldiers. Destroying the temples of Tuljapur, he reached near Satara 's 30 km north Y, near Shirwal. But Shivaji PratapgarhStay at the fort Afzal Khan sent his messenger Krishnji Bhaskar for a peace talks. He sent this message through him that if Shivaji accepts Bijapur's submission, Sultan will give him the rights of all those areas which are in the control of Shivaji. Simultaneously, Shivaji will receive a respected position in the court of Bijapur. Although Shivaji's minister and advisor were in favor of the UN Treaty, Shivaji did not come to the negotiations. He gave Krishnanji Bhaskar proper respect and kept him in his court and his envoy Gopinath sent him to the Afzal Khan to take stock of the situation. From Gopinath and Krishnaji Bhaskar, Shivaji thought that Afzal Khan wants to arrest Shivaji with the conspiracy of the treaty. So he sent a valuable gift to Afzal Khan instead of war, and thus convinced Afzal Khan to join the peace talks. At the site of the treaty, both of them were kept ambushed by their soldiers when they both met
After the death of Afzal Khan, Shivaji took over the fort of Panhala. After this, he also foiled the attack of Rustom Khan, while exercising power at the fort of Pavangarh and Vasantgarh. They were also captured on Rajapur and Davul. Now there was an atmosphere of terror in Bijapur and the feudal monks here decided to attack Shivaji by forgetting mutual differences. On October 2, 1665, the Bijapur army took over Panhala fort. Shivaji was trapped in the crisis but by taking advantage of the darkness of night he managed to escape. The Sultan of Bijapur took control of himself, withdrew his right to Panhala, Pawangarh, looted Rajapur and killed the head of the Sherangarh. At the same time KarnatakaDue to the rebellion of Siddi-jauhar, the Sultan of Bijapur compromised with Shivaji. In this treaty, Shivaji's father Shahaji worked as mediator. According to this treaty in 1662 Shivaji was recognized as an independent ruler by the Sultan of Bijapur. According to this treaty, the land of Kalyan in the north came to Ponda (250 km) in the south and from east to Indapur and to the west (150 km) land in Davul control of Shivaji. By this time in Shivaji's army there were 30000 pedestrians and 1000 cavalrymen.

बीजापुर से संघर्ष
इधर औरंगजेब के आगरा (उत्तर की ओर) लौट जाने के बाद बीजापुर के सुल्तान ने भी राहत की सांस ली। अब शिवाजी ही बीजापुर के सबसे प्रबल शत्रु रह गए थे। शाहजी को पहले ही अपने पुत्र को नियन्त्रण में रखने को कहा गया था पर शाहजी ने इसमें अपनी असमर्थता जाहिर की। शिवाजी से निपटने के लिए बीजापुर के सुल्तान ने अब्दुल्लाह भटारी (अफ़ज़ल खाँ) को शिवाजी के विरूद्ध भेजा। अफ़जल ने 120000 सैनिकों के साथ 1659 में कूच किया। तुलजापुर के मन्दिरों को नष्ट करता हुआ वह सतारा के 30 किलोमीटर उत्तर वाई, शिरवल के नजदीक तक आ गया। पर शिवाजी प्रतापगढ़ के दुर्ग पर ही रहे। अफजल खाँ ने अपने दूत कृष्णजी भास्कर को सन्धि-वार्ता के लिए भेजा। उसने उसके मार्फत ये सन्देश भिजवाया कि अगर शिवाजी बीजापुर की अधीनता स्वीकार कर ले तो सुल्तान उसे उन सभी क्षेत्रों का अधिकार दे देंगे जो शिवाजी के नियन्त्रण में हैं। साथ ही शिवाजी को बीजापुर के दरबार में एक सम्मानित पद प्राप्त होगा। हालांकि शिवाजी के मंत्री और सलाहकार अस सन्धि के पक्ष में थे पर शिवाजी को ये वार्ता रास नहीं आई। उन्होंने कृष्णजी भास्कर को उचित सम्मान देकर अपने दरबार में रख लिया और अपने दूत गोपीनाथ को वस्तुस्थिति का जायजा लेने अफजल खाँ के पास भेजा। गोपीनाथ और कृष्णजी भास्कर से शिवाजी को ऐसा लगा कि सन्धि का षडयन्त्र रचकर अफजल खाँ शिवाजी को बन्दी बनाना चाहता है। अतः उन्होंने युद्ध के बदले अफजल खाँ को एक बहुमूल्य उपहार भेजा और इस तरह अफजल खाँ को सन्धि वार्ता के लिए राजी किया। सन्धि स्थल पर दोनों ने अपने सैनिक घात लगाकर रखे थे मिलने के स्थान पर जब दोनों मिले तब अफजल खाँ ने अपने कट्यार से शिवाजी पे वार किया बचाव में शिवाजी ने अफजल खाँ को अपने वस्त्रों वाघनखो से मार दिया [१० नवंबर १६५९]|
अफजल खाँ की मृत्यु के बाद शिवाजी ने पन्हाला के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद पवनगढ़ और वसंतगढ़ के दुर्गों पर अधिकार करने के साथ ही साथ उन्होंने रूस्तम खाँ के आक्रमण को विफल भी किया। इससे राजापुर तथा दावुल पर भी उनका कब्जा हो गया। अब बीजापुर में आतंक का माहौल पैदा हो गया और वहाँ के सामन्तों ने आपसी मतभेद भुलाकर शिवाजी पर आक्रमण करने का निश्चय किया। 2 अक्टूबर 1665 को बीजापुरी सेना ने पन्हाला दुर्ग पर अधिकार कर लिया। शिवाजी संकट में फंस चुके थे पर रात्रि के अंधकार का लाभ उठाकर वे भागने में सफल रहे। बीजापुर के सुल्तान ने स्वयं कमान सम्हालकर पन्हाला, पवनगढ़ पर अपना अधिकार वापस ले लिया, राजापुर को लूट लिया और श्रृंगारगढ़ के प्रधान को मार डाला। इसी समय कर्नाटक में सिद्दीजौहर के विद्रोह के कारण बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के साथ समझौता कर लिया। इस सन्धि में शिवाजी के पिता शाहजी ने मध्यस्थता का काम किया। सन् 1662 में हुई इस सन्धि के अनुसार शिवाजी को बीजापुर के सुल्तान द्वारा स्वतंत्र शासक की मान्यता मिली। इसी सन्धि के अनुसार उत्तर में कल्याण से लेकर दक्षिण में पोण्डा तक (250 किलोमीटर) का और पूर्व में इन्दापुर से लेकर पश्चिम में दावुल तक (150 किलोमीटर) का भूभाग शिवाजी के नियन्त्रण में आ गया। शिवाजी की सेना में इस समय तक 30000 पैदल और 1000 घुड़सवार हो गए थे।

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