मुगलों से संघर्ष CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ




CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ,







Conflicts with the Mughals

Aurangzeb 's attention went to the south after the end of the race to become the King of North India . He was familiar with Shivaji's growing sovereignty and appointed his maternal uncle Shaista Khan as South Subedar for the purpose of controlling Shivaji. Shiska Khanna reached Poona by taking control of the fort of Soupon and Chakan with his 1,50,000 foz. He looted Mawal for 3 years. One night, Shivaji attacked them with his 350 mavlos. Shaista managed to escape through the window, but she had to face with four fingers in this order. The son of Shaista Khan, and forty defenders and countless soldiers were killed. After this incident, Aurangzeb made Shaista the Sub For Bengal instead of Deccan and was sent to replace Shahjada Muazzam Shasta.

Loot in Surat 

This win increased Shivaji's reputation. Six years, Shastakhan had destroyed 150000 troops and burnt the entire land of King Shivaji. In order to recover the damages, Shivaji started the looting of the Mughal areas. Surat was the stronghold of western traders at that time and the door to go to Hajj for Hindustani Muslims . It was a prosperous city and its port was very important. Shivaji did not loot the common man and robbed the wealthy businessman of Surat for six days with the army of four thousand, and then returned. This incident was mentioned by Dutch and British in their articles. Until that time the European traders had settled in India and other Asian countries. Nadir ShahUntil the invasion of India (1739) any European power did not think of invading the Indian Mughal empire .
Surat upset Shivaji smash through Aurangzeb said Inayat Khan to Ghiyasuddin Khan in place of SuratAppointed the army officer. And Shahjada Muazzam and deputy governor Raja Jaswant Singh were replaced by Dilir Khan and Raja Jaysingh. King Jai Singh invaded Shivaji with the help of Sivalans of Bijapur, European powers and small feudalists. In this war, Shivaji suffered loss and given the possibility of defeat, Shivaji sent a proposal of the treaty. According to this treaty held in June 1665, Shivaji will give 23 dams to the Mughals and thus they will have only 12 forts. The income from these 23 fortifications was 4 lakhs annas annually. Shivaji will meet the areas of Balaghat and Konkan, but in return 13 cats will have to pay 40 lakh hun. Apart from this, they will also give revenues of 5 lakh eleven per annum. Shivaji himself AurangzebBut his son Shambhaji will have to spend his time in the court of Mughal court. Shivaji against Bijapur will support the Mughals.

Invitation and march in Agra 

Shivaji was called in Agra where he thought he was not getting proper respect. In this, he showed up in his rush court and accused Aurangzeb of betrayal. Aurangzeb was upset with this and he seized Shivaji and installed 5000 soldiers on him. Aurangzeb intended to kill Raja Shivaji after a few days (on 18 August 1666) But both of Shivaji and Sambhaji ji succeeded in escaping with his unique courage and strategy [17 August 1666]. Sambhaji to Mathura leave a believer Brahmins here Shivaji Maharaj Benares , were , Puri occurring reached safely Rajgarh [2 September 1666]. This gave Marathas a new life. AurangzebBy suspecting Jaisingh, he was killed by poisoning him. After the initiative by Jaswant Singh, in 1668 Shivaji made a second treaty with the Mughals. Aurangzeb gave Shivaji the recognition of the king. Shivaji's son Shambhaji received the spirit of 5000 and Shivaji returned to the district of Poona , Chakan and Suma. However, the Mughals ruled over Sinhagad and Purandar. In 1670, Shivaji looted Surat Nagar for the second time. Shivaji took the property of 132 lakh from the city and when he returned, he defeated the Mughal army near Surat again.

मुगलों से संघर्ष

उत्तर भारत में बादशाह बनने की होड़ खत्म होने के बाद औरंगजेब का ध्यान दक्षिण की तरफ गया। वो शिवाजी की बढ़ती प्रभुता से परिचित था और उसने शिवाजी पर नियन्त्रण रखने के उद्येश्य से अपने मामा शाइस्ता खाँ को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया। शाइस्का खाँ अपने १,५०,००० फोज लेकर सूपन और चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर पूना पहुँच गया। उसने ३ साल तक मावल में लुटमार कि। एक रात शिवाजी ने अपने ३५० मवलो के साथ उनपर हमला कर दिया। शाइस्ता तो खिड़की के रास्ते बच निकलने में कामयाब रहा पर उसे इसी क्रम में अपनी चार अंगुलियों से हाथ धोना पड़ा। शाइस्ता खाँ के पुत्र, तथा चालीस रक्षकों और अनगिनत सैनिकों का कत्ल कर दिया गया। इस घटना के बाद औरंगजेब ने शाइस्ता को दक्कन के बदले बंगाल का सूबेदार बना दिया और शाहजादा मुअज्जम शाइस्ता की जगह लेने भेजा गया।

सूरत में लूट

इस जीत से शिवाजी की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। 6 साल शास्ताखान ने अपनी १५०००० फ़ौज लेकर राजा शिवाजी का पुरा मुलुख जलाकर तबाह कर दिया था। इस लिए उस् का हर्जाना वसूल करने के लिये शिवाजी ने मुगलक्षेत्रों में लूटपाट मचाना आरम्भ किया। सूरत उस समय पश्चिमी व्यापारियों का गढ़ था और हिन्दुस्तानी मुसलमानों के लिए हज पर जाने का द्वार। यह एक समृद्ध नगर था और इसका बंदरगाह बहुत महत्वपूर्ण था। शिवाजी ने चार हजार की सेना के साथ छः दिनों तक सूरत को के धनाड्य व्यापारीको लूटा आम आदमी को नहीं लूटा और फिर लौट गए। इस घटना का ज़िक्र डच तथा अंग्रेजों ने अपने लेखों में किया है। उस समय तक यूरोपीय व्यापारियों ने भारत तथा अन्य एशियाई देशों में बस गये थे। नादिर शाह के भारत पर आक्रमण करने तक (1739) किसी भी य़ूरोपीय शक्ति ने भारतीय मुगल साम्राज्य पर आक्रमण करने की नहीं सोची थी।
सूरत में शिवाजी की लूट से खिन्न होकर औरंगजेब ने इनायत खाँ के स्थान पर गयासुद्दीन खां को सूरत का फौजदार नियुक्त किया। और शहजादा मुअज्जम तथा उपसेनापति राजा जसवंत सिंह की जगह दिलेर खाँ और राजा जयसिंह की नियुक्ति की गई। राजा जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान, यूरोपीय शक्तियाँ तथा छोटे सामन्तों का सहयोग लेकर शिवाजी पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में शिवाजी को हानि होने लगी और हार की सम्भावना को देखते हुए शिवाजी ने सन्धि का प्रस्ताव भेजा। जून 1665 में हुई इस सन्धि के मुताबिक शिवाजी 23 दुर्ग मुग़लों को दे देंगे और इस तरह उनके पास केवल 12 दुर्ग बच जाएँगे। इन 23 दुर्गों से होने वाली आमदनी 4 लाख हूण सालाना थी। बालाघाट और कोंकण के क्षेत्र शिवाजी को मिलेंगे पर उन्हें इसके बदले में 13 किस्तों में 40 लाख हूण अदा करने होंगे। इसके अलावा प्रतिवर्ष 5 लाख हूण का राजस्व भी वे देंगे। शिवाजी स्वयं औरंगजेब के दरबार में होने से मुक्त रहेंगे पर उनके पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार में खिदमत करनी होगी। बीजापुर के ख़िलाफ़ शिवाजी मुगलों का साथ देंगे।
आगरा में आमंत्रण और पलायन
शिवाजी को आगरा बुलाया गया जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। इसके ख़िलाफ़ उन्होंने अपना रोश भरे दरबार में दिखाया और औरंगजेब पर विश्वासघात का आरोप लगाया। औरंगजेब इससे क्षुब्ध हुआ और उसने शिवाजी को नज़रकैद कर दिया और उनपर ५००० सैनिकों के पहरे लगा दिये। कुछ ही दिनों बाद (१८ अगस्त १६६६ को) राजा शिवाजी को मार डालने का इरादा औरंगजेब का था। लेकिन अपने अजोड साहस ओर युक्ति के साथ शिवाजी और सम्भाजी दोनों इससे भागने में सफल रहे[१७ अगस्त १६६६]। सम्भाजी को मथुरा में एक विश्वासी ब्राह्मण के यहाँ छोड़ शिवाजी महाराज बनारस, गये, पुरी होते हुए सकुशल राजगढ़ पहुँच गए [२ सितम्बर १६६६]। इससे मराठों को नवजीवन सा मिल गया। औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा डाली। जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार सन्धि की। औरंगजेब ने शिवाजी को राजा की मान्यता दी। शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को पूना, चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया। पर, सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुग़लों का अधिपत्य बना रहा। सन् 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा। नगर से 132 लाख की सम्पत्ति शिवाजी के हाथ लगी और लौटते वक्त उन्होंने मुगल सेना को सूरत के पास फिर से हराया।

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