दुर्गों पर नियंत्रण CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ

CHHATRAPATI SHIVAJI MAHARAJ,




Control of fortifications
Virgil Shivaji on the throne in Raigad fort
The fort of Toran was 30 kilometers away in the south west of Poona . Shivaji sent an envoy to Sultan Adilshah and sent the news, he is ready to pay a better amount than the first fortress and this area should be handed over to him. He had already taken Adilshah 's court ceremonies in his favor and according to the advice of his courtiers, Adilshah made Shivaji Maharaj as the ruler of that fort. With the property found in that fort, Shivaji Maharaj used to repair the defenses of the fort. This was a fortress of Rajgad 10 km away and Shivaji Maharaj also took control over this fort.
When Adilshah got the name of Shivaji Maharaj's policy of this empire expansion, he was upset. He asked Shahaji Raje to keep his son in control. Shivaji Maharaj took care of the area of ​​his father without taking care of his father, and stopped the regular levy. After Rajgarh, they took control of the fort of Chakan and then on the fort of Kondana. After taking possession of Kondana (Kondhana), he had to be bribed. After Aurangzeb captured Mizraja Jaising, he captured 23 forts. Afterwards, the Majha Tanaji Malusare of Shaji Maharaj captured the Kondhana fort but on that war he attained the desolation After empowering Kondana in memory, it was named Sinhagad . Shahaji Raje to PoonaAnd the secretariat of Soupa was given and the fort of Sapa was in the hands of his relative, Mohite. Shivaji Maharaj attacked the fort of Supa at night and took control over the fort and sent Baji Mohite to Karnataka along with Shahaji Raje . Some part of his army also came in the service of Shivaji Maharaj. At the same time, the killer of Purandar died and the fight started in his three sons for the heir to the fort. On the invitation of two brothers, Shivaji Maharaj reached Purandar and resorted to diplomacy, he made all the brothers captive. In this way his authority was established on the fort of Purandar. In the event of the incident, Shivaji Maharaj had no war or sarcasm. By 1647, they had become the ruler of the territory from Chakan to Neera. With his enlarged military power, Shivaji Maharaj planned to enter the plains.
After the formation of a cavalry, Shivaji Maharaj sent an army against Konkan under the leadership of Abaji Sonder . Abaji took over nine other fortifications including Konkan . Apart from this, the fort of Taal, Mosmal and Raiti also came under Shivaji Maharaj. All the property of the loot was kept safe in Raigad . By freeing the Governor of Kalyan, Shivaji Maharaj moved towards Colaba and incited the chiefs to fight against foreigners.

दुर्गों पर नियंत्रण
रायगढ़ दुर्ग में सिंहासन पर विराजित शिवाजी
तोरण का दुर्ग पूना के दक्षिण पश्चिम में ३० किलोमीटर की दूरी पर था। शिवाजी ने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना दूत भेजकर खबर भिजवाई की वे पहले किलेदार की तुलना में बेहतर रकम देने को तैयार हैं और यह क्षेत्र उन्हें सौंप दिया जाये। उन्होंने आदिलशाह के दरबारियों को पहले ही रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया था और अपने दरबारियों की सलाह के मुताबिक आदिलशाह ने शिवाजी महाराज को उस दुर्ग का अधिपति बना दिया। उस दुर्ग में मिली सम्पत्ति से शिवाजी महाराज ने दुर्ग की सुरक्षात्मक कमियों की मरम्मत का काम करवाया। इससे कोई १० किलोमीटर दूर राजगढ़ का दुर्ग था और शिवाजी महाराज ने इस दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया।
शिवाजी महाराज की इस साम्राज्य विस्तार की नीति की भनक जब आदिलशाह को मिली तो वह क्षुब्ध हुआ। उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियन्त्रण में रखने को कहा। शिवाजी महाराज ने अपने पिता की परवाह किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया और नियमित लगान बन्द कर दिया। राजगढ़ के बाद उन्होंने चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और उसके बाद कोंडना के दुर्ग पर। कोंडना (कोन्ढाणा) पर अधिकार करते समय उन्हें घूस देनी पड़ी।ऊसके बाद औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह को भेजकर २३ किलों पर कब्जा किया बाद में शिाजी महाराज के मावला तानाजी मालुसरे ने कोंढाणा दुर्ग पर कब्जा कीया पर उस युद्ध में वह विरगती को प्राप्त हुआ उसकी याद में कोंडना पर अधिकार करने के बाद उसका नाम सिंहगढ़ रखा गया। शाहजी राजे को पूना और सूपा की जागीरदारी दी गई थी और सूपा का दुर्ग उनके सम्बंधी बाजी मोहिते के हाथ में थी। शिवाजी महाराज ने रात के समय सूपा के दुर्ग पर आक्रमण करके दुर्ग पर अधिकार कर लिया और बाजी मोहिते को शाहजी राजे के पास कर्नाटक भेज दिया। उसकी सेना का कुछ भाग भी शिवाजी महाराज की सेवा में आ गया। इसी समय पुरन्दर के किलेदार की मृत्यु हो गई और किले के उत्तराधिकार के लिए उसके तीनों बेटों में लड़ाई छिड़ गई। दो भाइयों के निमंत्रण पर शिवाजी महाराज पुरन्दर पहुँचे और कूटनीति का सहारा लेते हुए उन्होंने सभी भाइयों को बन्दी बना लिया। इस तरह पुरन्दर के किले पर भी उनका अधिकार स्थापित हो गया। अब तक की घटना में शिवाजी महाराज को कोई युद्ध या खुनखराबा नहीं करना पड़ा था। १६४७ ईस्वी तक वे चाकन से लेकर नीरा तक के भूभाग के भी अधिपति बन चुके थे। अपनी बढ़ी सैनिक शक्ति के साथ शिवाजी महाराज ने मैदानी इलाकों में प्रवेश करने की योजना बनाई।
एक अश्वारोही सेना का गठन कर शिवाजी महाराज ने आबाजी सोन्देर के नेतृत्व में कोंकण के विरुद्ध एक सेना भेजी। आबाजी ने कोंकण सहित नौ अन्य दुर्गों पर अधिकार कर लिया। इसके अलावा ताला, मोस्माला और रायटी के दुर्ग भी शिवाजी महाराज के अधीन आ गए थे। लूट की सारी सम्पत्ति रायगढ़ में सुरक्षित रखी गई। कल्याण के गवर्नर को मुक्त कर शिवाजी महाराज ने कोलाबाकी ओर रुख किया और यहाँ के प्रमुखों को विदेशियों के ख़िलाफ़़ युद्ध के लिए उकसाया।

Comments